Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 40
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

। द्रेष्काण चक्र द्वादशांश विधि स्थादद्गादशांश इह राशित एव गेहूं होराथ दृकक्‍्कनवमांशकसूयय भागाः । त्रिशांशकइच षडिसे कथितास्तु वर्गा: सौम्येः शुभं॑ भवति चाशुभसेव पाप: ॥ ४०४ अस्वयः--इह राशित: एव द्वादशांश: (स्यात्‌) अथ गेहूं, होरा दृककनवमांशकसूर्य- भागा: च॒ त्रिशांशक: इमे षड़वर्गा: कथिता:, (तत्र) सौम्यें: (षड्वर्गं:) शुभ पापी: च अशुभ (फलं) भवति ॥ ४० ।। दो अंदा तीस कलाओं का एक द्वादशांश होता है । एक राशि में बारह द्वादशांश होते हैं। उनका यह क्रम है कि जिस राशि में द्वादशांशों का विचार करना हो उसी राशि से लेकर क्रम से बारह राशियों के द्वादशांश होते हैं। यथा मेष राशि में पहिला द्वादशांश मेष ही का, दूसरा वृष का, तीसरा मिथुन का, चौथा कक का, पाँचवाँ सूर्य का; छठा कन्य। का, सातवाँ तुला का, आठवाँ वृद्दिचवक का, नवाँ धनु का, दशवाँ मकर का, गेरहंवाँ कुम्म का और बारहवाँ मीन का द्वादशांश होता है । ऐसे ही वृष राशि में पहिला द्वादशांश वृष का और दूसरा मिथुन का इत्यादि । मुहत्तचिन्तामणि १२० हदादशांश चक्र । .. | कं> |तु० |बु० |ध० | म० | कुम्भ कक मि ० व्‌० मे७ समा मैसमा नि विन ७।२० मि० है... मना इआ 2 |क० जि “थक 4७७७७ जा अनासननअंऊफभ«मणभ»«%म «मनन नाक)...>नगनगगनगपगगनगनगनननननननननन५.32न्‍अनल्‍ननझनया 7रतओ। |सि० | कं० तु० | बृ० अन>-न++मनन-. १७० सि० कण क्‌० का तु० लेक अमक बु० नल अन्‍कननथ ॑न+--मक-+- -.. अन्‍ममगन्‍-ाझााझााा ) अिनमननननननननकननकनानान. वअिीसीनी-ााा| घ० तन. न 3५933... न अत नीन्‍ञलधँक्‍ | म० | कुम्भ सिवा»... स्‍आ++-.34मवमननन कक. ५.८. 0पन्‍«««मममक+न«ंं«मम«-नमबमन्‍्ममक 0 वतत3>].++73777 -5नम»»+-मक 4 वो | <-७-हन्‍न्‍-्॑॑वाा्ा'ााछन मो० | मे० ब्‌० ब्‌० मि० 5. नाओ घ० म० मी ० कुम्भ मे० १२॥३० |सि० | कं० | तु० | वृ० धर | म० कुम्भ |मी० |मे० | बु० | मि० १५ | कं० | तु० |बु० |ध० | म6 | कुम्भ |मी० |मे० | व्‌ृ० |मि० |क० |सि० वु० १७।३० | तु० २० बु० लू २२।३० लिननीमशननननरकरननकल लकी | ध० धघ० वि न म० |घ० म० की. अं कुम्भ | म० | कुम्भ कुम्भ वा मी० | मे० |सन्‍मअब्>»न्‍्कम»»क% 3-८तमनककननन-त ८. म० २५ ही आल नाल है कुम्भ विमानन मे रा ८ मी० कीओ तेकक. मे० मी० आओ + बुक ० मी० 2इक में० करषणणंधााााा --न्‍मन्‍मन्‍जममन+ममममामामनमममम ब्‌० कब मी० | मे० मे० बु० _-.*->नगमगन--खिलझणणाओ | ऑच७ोॉजओ्िी+-+ तप ब्‌० मि० बु० मि० मि० | क० लि >> नम_, | क० न्‍ सव->++--मम-फमम-- >«८न-++पकमममननमक. |क० सिंह तीन |सि० | कुं० क्‌ं० तु० 3»... -त-ल्‍33+--पाममन+नमओ. है... नमनननमनमा नभााना-क-क-जममानाक सि० क्‌ं० कं० तु० तु० ब्‌० ाइअरष्यिन्‍ंअरंलिकलीई मि० हक वीमीमीकनकिकरिकरक नल... मिल मि० 3 | क० के ३सि० 0 बु० क्‌छ सि० 3 मिमिननशरल कलम आओ 2 5 मै ांाभााा वी नल ५ 9 ० ब्‌० सीघजऊ म० कल कं० घ० कक /.अप षड़्वर्ग राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश, और त्रिशांश ये छः षड़्वर्गे कहे जाते हैं। षड्वर्ग शुभ ग्रहों सेशुभ और पाप ग्रहों सेअशुभ हो जाता है, अर्थात्‌ यदि शुभ ग्रह शुभ ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो तो शुभ फल होता है और शुभ ग्रह पाप ग्रहों केराशि, होरा, द्रेष्काणादि में, अथवा पाप ग्रह शुभ ग्रहों केराशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो तो सम फल होता है। और पाप ग्रह पाप ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो तो अशुभ फल होता है ॥| ४० ॥।

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