। अन्वय:--समगृहमध्ये (क्रमेण) शशिरविहोरा रविशशिनो: (क्रमेण ) ज्ञेया || ३८ ।। (भवत्ति) विषमभमध्ये सा (होरा) पन्द्रह अंशों काएक होरा होता है । एक राशि में दो होरा होते हैं । वृष-कर्कादि सम राशियों में पहिला चन्द्रमा का और दूसरा सूर्य का होरा होता है और मेष-मिथुनादि विषम राशियों में पहिला सूर्य का और दूसरा चन्द्रमा का होरा होता है ॥| ३८ ॥। मुहत्तचिन्तामणि १्श्८ त्रिशांश बाणदक्रज्ञजीवशनिभूतनयस्थ दइलाष्टपः्वविशिखा: समराशिमध्ये । त्रिशांशकों विषमभे विपरीतमस्माद द्रेष्काणकाः प्रथमप्चनवाधिपानाम् ॥। ३९ ॥। अन्वय:--समराशिमध्ये बाणशैलाष्टपञचविशिखा: (अंशाः) (क्रमेण) शुक्रज्ञजीवशनिभूतनयस्य॒त्िशांशका (भवन्ति), विषमभे अस्मात् विपरीत तथा प्रथमपण्चनवाधिपानां द्रेष्काणका: | द | (भवन्ति) ॥ ३४६॥। बृष-कर्कादि सम राशियों में पहिले पाँच अंशों का स्वामी शुक्र, तदनन्तर सात अंशों का स्वामी बुध, तदनन्तर आठ अंझों का स्वामी बृहस्पति, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शनैश्चर, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी कक लक कनीनीननीक मंगल होता है। मेष-मिथुनादि विषम राशियों में इससे विपरीत अर्थात् पहिले पाँच अंशों का स्वामी मंगल, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शनेइचर, तदनन्तर आठ अंझों का स्वामी बृहस्पति, तदनन्तर सात अंशों का स्वामी बुध, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शुक्र होता है ॥-३९. ॥ त्रिज्ञांश चक्र <-4 कट २२ +4 की पक कक 4 ७ ल्77% >प ्कल साथ): कारन नमक जताअनका--4-+नन+हतकी हे ७५-७० ता+-<०२१०+-4 +नक..-२०७ के &«__ नेक <_- मं० ५ | ५ कह बु० । ८ । हे; स्ज द न द्रष्काण क्|द | बू० श० . |कण दश अंशों का एक द्रेष्काण होता है। एक राशि में तीन द्रेष्काण होते पहिले हैं। जिस राशि में द्रेष्काण जानना हो उस राशि का स्वामी ही दक् द्रेष्काण का स्वामी होता है, और उससे पाँचवीं राशि का स्वामी दूसरे ।हा द्रेष्काण का, और नवीं राशि का स्वामी तीसरे द्रेष्काण का स्वामी होता $ ााअाााााजानानानानानानानणनणथईथईथईथईएईएईथआथआथआथख आन नि विवाहप्रकरण ११९ है । उदाहरण--मेष राशि में पहला द्रेष्काण मंगल का, दूसरा सूर्य का और तीसरा द्रेष्काण बृहस्पति का होता है ॥ ३९॥
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