। अ० क० च० ट० त० प० य० श० ये आक वरगे हैं। इनमें गरुड़ का अवर्ग, बिलार का कवर्गं, सिंह का चवर्ग, कुंत्ता का टवर्ग, साँप का तवर्ग, मूस का पवर्ग, हरिण का यवर्ग और भेंड़ का शवर्ग है। इनमें प्रत्येक वर्ग का पाँचवाँ वर्ग वरी होता है। यथा गरुड़ का साँप, बिलार का मूस, सिंह का हिरण, कुत्ता का भेंड़ इत्यादि । इन वर्गों का प्रयोजन यह है कि कन्या के नाम का पहिला अक्षर जिस वर्ग में होउससे वर के नाम का पहिला अक्षर पाँचवें वर्ग में होतो विवाह अशुभ होता हैऔर कन्या और वर के नाम का पहिला अक्षर एक ही वर्ग में होअथवा उदासीन वर्ग में हो तो विवाह शुभ होता है ॥| ३५॥ अवर्गादि चक्र -_अआइईउऊऋऋलूटूएऐओजओ_ अआइईउ ऊकऋ ऐओ ओ कखगधघधडः चछजझबउव्य टठडढ'ण तथदधन पफबभम यरलव शषसह मुहत्तचिन्तामणि ११६ नक्षत्र और राशि एक वा भिन्न होने में विशेष राश्यक्ये चेद्धिन्षमृक्ष हयोः स्याह्नक्षत्रक्ये राशियुग्मं तथव । नाडीदोषो नो गणानां च दोषो नक्षत्रेक्पे पादभेदे शुभं स्थात् ॥ ३६॥ अन्वय:-द्वयो: (कन्यावरयो:) राश्यैक्ये चेत् भिन्नं ऋक्ष तथ॑व नक्षत्रेक्ये राशियुग्म स्पात् तदा नाडीदोषो नो च गणानां दोषों नो (भवेत्) | तथा नक्षत्रेक्ये पादभेदे (सति) शुभं स्थात् ॥| ३६ |। यदि कन्या और वर की जन्मराशि एक हो और जनमनक्षत्र भिन्न भिन्न हों, अथवा जन्मनक्षत्र एक हो और जन्मराशि भिन्न भिन्न हों तो नाड़ीदोष, गणदोष और तारादोष नहीं होता ।एक राशि और भिन्न नक्षत्र का उदाहरण--शतभिष नक्षत्र में कन्या का जन्म और पूर्वाभाद्रपद के तीन पाद के अन्तर वर का जन्म हो तो नक्षत्र भिन्न भिन्न हैऔर कुम्भ राशि एक वापदके तीन पाद भाद्गर ही है। एक नक्षत्र और भिन्न राशि का उदाहरण--पूर् के अन्तर कन्या का जन्म और चौथे पाद में वर का जन्म हो तो नक्षत्र एक ही है और राशि कुम्भ और मीन दो हैं । एक नक्षत्र और भिन्न पाद का रणी नक्षत्र के प्रथम पाद में वर का जन्म और द्वितीय पाद में उदाहरण--भ कन्या का जन्म हो तो एक राशि और नक्षत्र होने पर भी शुभ है ॥ ३६॥
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