Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 37
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

। राशियों के स्वामी चन्धज्ञा: कविभौमजीवशनिसौरयो गुरुः । कुजशुक्रसौम्यशशिसूर्य इह राशिपाः क्रियमृगास्यतौलिकेन्दुभतो नवांशविधिरुच्यते बुधः ॥ ३७॥ अन्वयः--इह कुजशक्रसौम्यशशिसूर्यचन्द्रजा: कविभौमजीवशनिसौरय: गुरु: (क्रमेण ) राशिपा: (ज्ञैया:) (तथा) क्रियमृगास्यतौलिकेन्दुभत: नवांशविधिः बुधे: उच्यते ॥| ३७ ॥। मेष राशि का मंगल, वृष का शुक्र, मिथुन का बुध, कर्क का चन्द्रमा, सिंह का सूर्य, कन्या का बुध, तुला का शुक्र, वृश्चिक का मंगल, धनु का बृहस्पति, मकर और कुम्भ का शनेइचर और मीन राशि का बृहस्पति स्वामी है ॥। ३७॥। . राशीश-चक् व० मे० ।ऋण मि० |क० शुरु | बुँ०ण | चु० ।सस्‍्बा० मैं० द घ० कु० न | सि०| तु० ब्‌० बु० शुक्र | म० | बु० सूये ५0७० ंगांओ विवाहप्रकरण ११७ अब नवांशविधि कहते हैं । प्रत्येक राशि में तीस अंश होते हैंऔर एक अंश में साठि कला होती हैं। तीत अंश बीस कलाओं का एक नवांश होता है । नव नवांश एक राशि में होते हैं। उत्तका क्रम यह है कि मेष राशि में मेष से लेकर धनुराशिपयंन्‍्त नव राशियों के नव नवांश, वृष राशि में मकर से लेकर कन्याराशिपयेन्‍त नव राशियों के नव नवांश, मिथुन राशि में तुला से लेकर मिथुनराशिपयँनत नव राशियों के नव नवांश, कक राशि में कक से लेकर मीनराशिपय॑ंन्त नव राशियों के नव नवांश होते हैं। फिर सिह राशि से वृश्चिक तक और धनु राशि से मीन तक इसी उक्त विधि से नवांशों का भोग होता है ॥ ३७॥

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