Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 35
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

दम्पत्योरेकनाड्यां परिणयनमसन्मध्यनाडस दास्रभ॑ च एकनाडी | पुष्यन्दुत्वाष्ट्रअस्बय: ज्थेष्ठारौद्रायमाम्भ:पतिभयुगयुग ी । वाय्वग्निव्यालविश्वोड्युगयुगगं पौष्णभ नाड़ या मध् च ल्ये बुध् योनि भं ुजल कवस मित्रान्त ां हि णयनं असत्‌ स्यात्‌ । मध्यनाड्य परि : त्यो दम्प यां ाड् एकन । त्‌ स्था ी च्‌ अपरा नाड मृत्यु: स्थात्‌ ॥। २४ ॥। भिष, ये दो-दो नक्षत्र अर्थात्‌ ज्येष्ठा, आर्दरो, उत्तराफाल्गुती और शत नी-हस्त, शतभिष-पूर्वाभाद्रपद और ज्येष्ठा-मूल, आर्द्रो-पुनर्वेसु, उत्तराफाल्गु पुष्य, मृगशिरा, चित्रा, है। ी ाड िन आद की ं त्रो नक्ष नव अदिवनी, इन वाफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, इन ने पूर् ढ़, वाषा पूर् ां, ष्ठ घनि ी, भरण अनुराधा, दो ्तिका, आइलेषा, उत्तराषाढ़ ये दोकृत , ाती स्व है। डी यना मध् की ं नक्षत्रो रोहिणी, आइलेषा-मघा, उत्तरात्राईनक्षत्र अर्थात्‌ स्वाती-विशाखा, कृत्तिकां कीअच्त्यनाडी है । , श्रवण और रेवती इन नव नक्षत्रो विवाहप्रकरण न ० चित्रा अनु ० आए्ले० |उ>०्षा० ११५ हुं० |सिह पुन० | प्‌ू०णभा०। सन अ० |आशण०्ना० प भ० | बे० | पुृ०षा० |पू०फा० |उ०भा० मण०नाड़ी वि० | रो० म० श्रवण रे० अंण्ना० कन्या का जन्मनक्षत्र और वर का जन्मनक्षत्र यदि किसी एक नाडी में हो तो विवाह अशुभ होता है और यदि उक्त दोनों नक्षत्र मध्य नाड़ी में हों तो वर और कन्या की मृत्यु होती है ॥॥ ३४ ।। एक अन्य प्रकार का वर्गंक्ट अफचटतपयहवर्गाः खगेशमार्जारसिहशुनाम्‌ । सर्पाखुमृगाषोनां निज पन्चधमवरिणामष्टो ॥ ३५१ अन्वयः-निजं पञ्चमवरिणां खगेशमार्जारसिहशुनां सर्पाखमृगावीनां (क्रमात्‌) अष्टों अकचटतपयशवर्गा: (ज्ञेया:) ॥ ३५॥

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