अन्बयः--य्रुमणे: [सूर्यस्यथ] कुजेज्यशशिन:ः मित्नाणि, शुक्राकंजौ वैरिणौं, सौम्य: अस्य सम: । विधो: बूधरवी मित्रे, अस्य च द्विषत् न, शेषा: अस्थ समा: । कुजस्य चन्द्रेज्यसूर्या: सुहृद:, बुध: शत्रु, शुक्रशनीसमौ । च (तथा) शशभृत्सूनो: सिताहस्करौ मित्रे, अस्य शशी रिपुः, गुरुशनिक्ष्माजा: समा: | गीष्पते: अकंकुजेन्दव: मित्राणि, बधसितों शत्रू, सूयंज: सम: । कव: सौम्यशनी मित्रे, शशिरवी शत्त्, कुजेज्यां समौ । शने: शक्रब॒धौ मित्रे, शशिरविक्ष्माजा द्विष:, अन्य: समः सूर्य केमज्भल, ॥| २७-२८ ।। बृहस्पति और चन्द्रमा मित्र, शुक्र और हशनेदचर श्र और बुध सम हैं । चन्द्रमा केबुध और सूर्य मित्र, शत्र कोई नहीं, शेष मज्जल, बृहस्पति, शनि और शुक्र सम हैं। मज्भल के चन्द्रमा, बृहस्पति और सूर्य मित्र, बुध शत्रु और शुक्र, शनश्चर सम हैं | बुध के शुक्र और सूर्य मित्र, चन्द्रमा शत्रु, बृहस्पति, शनेइ्चर और मज्ूल सम हैं। बृहस्पति के सूर्य मज्जल और चन्द्रमा मित्र, बुध और शुक्र शत्रु और शनेचर सम हैं । शुक्र के बुध और शनहचर मित्र हैं, चन्द्रमा और सूर्य शत्रु, मड़्ल और बृहस्पति सम हैं। शनशचर के शुक्र और बुध मित्र, चन्द्रमा, सूर्य और मजड्भल शात्र और बृहस्पति सम हैं। इनके कहने का प्रयोजन यह है कि वर की जन्मराशि का ईश और कन्या की जन्मराशि का ईश परस्पर मित्र हों तो विवाह शुभ, शत्रु हों तो अशुभ और सम हों तो शुभ अशुभ कुछ नहीं होता ॥ २७-२८ ।। रक्षोनरामरगणा:ः क्रमतो मघाहिवस्विन्द्रमूलवरुणानलतक्षराधा:। पूर्वोत्तरात्रयविधातृयमेश भानि मेत्रादितीन्दु हरिपौष्णमरुललघनि ॥ २९॥
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