Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 27
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

। योति,. अद्विनी और शतभिष घोड़ा योनि, स्वाती और हस्त भंसा योनि, _ ध्निष्ठा और पूर्वाभाद्रपद सिंह योनि, भरणी और रेवती हाथी योनि, उत्तरापुष्य और कृत्तिका मेढ़ा योनि, श्रवण और पूर्वाषाढ़ वानर णी सर्प योनि, षाढ़ और अभिजित्‌ न्‍योला योनि, मृगशिरा और रोहि योनि, पुनर्वेसु ज्येष्ठा और अनुराधा हरिण योनि, मूल और आंद्रा कुक्‍्कुर चित्रा और आइलेषा बिलार योनि, मंघा और पूर्वाफाल्गुनी मूस योनि, गौ योनि और विशाखा व्यान्न योनि, उत्तराफाल्गुनी और उत्तराभाद्रपद कहे जाते हैं। यहाँ एक इलोक के एक पाद में कहे हुए चार नक्षत्रों की दो निगदित: बोनियों का परस्पर महावेर होता है। यथा “अदिवन्यम्बुपयो्ईयो परस्पर स्वात्यरक॑यों: कासर:” इस एक पाद में कहे हुए घोड़ा और भेंसा का बैर होता है। इसलिये वेर योनिवाले वर-कन्या का विवाह उचित नहीं विवाह करना है। भिन्न-भिन्न पाद में कही हुई योनिवाले वर-कन्या का चाहिए ॥। २५-२६ ॥। व मे० क्वर‍ञट ब्र वर गौ । वानर |न्‍यो० | साँ |हरि०| कु० बिलार।| मूस जि. द + पु० |अवण छत । 55 ज्ये० | मू० |पु० |म० |वि० .भा. कृ० |पृ०षा |अभि. |रो० | अनु० |आ० 5इइलेषा। पूफा |चि० उ.फ़ा. ग्रहमेत्नीक्‌ट मित्राणि छुमणे: कुजेज्यशशिनः शुक्राकंजो वेरिणो सौम्यह्चास्य समो विधोबं धरवी मित्रे न चास्य दिषत्‌ । शोषाइचास्थ समाः कुजस्थ सुहृदवचन्द्रज्यसूर्या बुधः शत्रु: शुक्रलननी समौ च शहाभुृत्सूनों: सिताहस्करो ॥ २७॥ मित्रे चास्य रिपुः शश्ी गुरुशनिक्ष्माजा: समा गीष्पतेमित्राण्यकंकुजेन्ददोी बुधसितो शात्र्‌ ,समः सुूर्यजः। विवाहप्रकरण १११ मित्रे सौम्यशनी कवेः शशिरवी शात्र्‌ कुजेज्यौं समौ मित्रे शुक्रबुधो शनेः शशिरविक्ष्माजा द्विषोष्न्यः समः ॥॥ २८॥

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