Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 30
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--म घाहिवस्विन्द्रमलवरुणानलतक्षराधा पूर्वोत्तरात्रयविधात॒यमेशभानि मैत्रादितीन्दुहरिपौष्णममरुललघनि क्रमत: रक्षोनरामरगणा (ज्ञेया:) ॥ २६॥। >> -+७४-# २८४-7--- भुहत्तचिन्तामणि ११२ मघा, आइलेषा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा, मूल, शतभिष, क्ृत्तिका, चित्रा और विशाखा ये नव नक्षत्र राक्षसगण, तीनों पूर्वा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, भरणी और आर्द्रा ये नव नक्षत्र मनुष्यगण; अनुराधा, पुनवंसु, मृगशिरा, श्रवण, रेवती, स्वाती, अश्विनी, हस्त और पुष्य ये नव नक्षत्र देवतागण कहे जाते हैं | २९॥ म० दम घ० मृ० ज्ये० न पू०फा० | पूृ०षा० |पू०भा० |उ०फा० |उन्षा० |उन्भा० अनु ० पुन॒० ० श्रवण कृ० वि० | चि० [लिन आर्द्रा ।मनुष्य |रो० | भ० पुष् | रेवती | स्‍्वाती । अश्वि० | हु० देवता गणों का फल निजनिजगणमध्ये प्रीतिरत्युत्तमा स्थादमरसनुजयो: सा सध्यमा संप्रदिष्टा । असुरमनुजयोचचेन्मृत्युरेव प्रदिष्टो दनुजविदुधयोः. स्यादह्वरमेकान्ततो5चत्र ॥ ३० ॥ अन्बयः--निजनिजगणमध्ये अत्युत्तमा प्रीति: स्थात्‌ ॥ अमरमन्‌जयो: सा (प्रीतिः) मध्यमा सम्प्रदिष्टा ।असुरमन्‌जयो: चेतूु, (तदा) मृत्यु: एवं प्रदिष्ट: | अत्न दनुजविबुधयो: एकान्ततः बैरं स्थात्‌ ॥ ३० ॥ द वरकन्या का जन्मनक्षत्र एक ही गुण में होतो विवाह होने पर उन दोनों की अतिशय प्रीति होती है । वरकन्या में सेकिसी का जन्मनक्षत्र देवतागण में और किसी का मनुष्य गण में हो मध्यम प्रीति होती है। किसी का जन्मनक्षत्र राक्षसगगण में और किसी का मनुष्यगण में हो तो वरकन्या का मरण होता है । किसी का जन्मनक्षत्र देवतागण में और किसी का राक्षसगण में हो तो सदा स्त्री-पुरुष का वेर रहता है ॥ ३० ॥

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