अन्वयः--अहिजौ कन्यासुतौ सुतरां श्वश्रविनाशं विधत्त:., च निऋतिजोौ कन्यासुतो एवश्रं हतः, ज्येष्ठाभजाततनया स्वधवाग्रजं॑ (हन्ति ), शक्राग्निजा देव रना शकर्त्री भवति ॥ १६ || द्वीशाद्यपादत्रयजा कन्या देवरसौंख्यदा, मूलान्त्यपादसर्पाद्यपादजातौ तयो: (श्वश्रृश्वशुरयो:) शुभो ।। २० ॥ आइ्लेषा में उत्पन्न वर वा कन्या सासु का, मूल नक्षत्र में उत्पन्न कन्या वा वर इवशुर का, ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने पति के बड़े भाई का और विशाखा में उत्पन्न कन्या अपने पंति के छोटे भाई का नाश करती है ॥ १९॥ विशाखा के पहिले तीन चरण में उत्पन्न कन्या अपने पति के छोटे भाई को सुख देती है, मूल नक्षत्र के चौथे चरण में उत्पन्न कन्या वा वर इवसुर को और आएइरलेषा नक्षत्र के पहिले चरण में उत्पन्न कन्या वा वर सासु को सुख देते हैं || २० ।। अच्हदूट वर्णो वश्यं तथा तारा योनिदच ग्रहमंत्रकम् । गणमंत्रं भक्टं च नाडी चते गुणाधिकाः॥ २१॥ अन्वयः--सुगम: ।। २१ ॥। वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रहमैत्री, गणमैत्री, भक्ट और नाड़ी, ये आठ कट विवाह में अवश्य विचारना चाहिए । इनमें उत्तरोत्तर का एक गुण अधिक है । यथा वर-कंन्या की वर्णमैत्री रहते एक गुण, कन्या की जन्मराशि वर की जन्मराशि के वरय रहते दो गुण, परस्पर तारा शुभ रहते तीन गुण, वर- मुहत्तचिन्तामणि श्ण्ष कन्या के जन्म-नक्षत्रों कीपरस्पर योनिमैत्री रहते चार ग्रुण, वर-कन्या के जन्मराशीश ग्रहों की परस्पर मित्रता रहते पाँच गुण, वर-कन्या के जन्मनक्षत्रों कीपरस्पर गणमैत्री रहते छः गुण, वर-कन्या की जन्मराशि की परस्पर शुभ संख्या रहते सात गुण और वर-कन्या के जन्मनक्षत्रों की नाड़ी भिन्न रहते आठ गुण होते हैं॥ सब मिलकर छत्तीस गुण जिस वर-कन्या के हों उनका विवाह बहुत शुभ होता है ॥ २१॥
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