Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 22
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

वर्णकूट द्विजा झषालिककंटास्ततो नपा विशो5डिसप्रजा: । वरस्य वर्णतोषईधिका बधून शस्यते बुधः ॥ २२७ अन्वयः--झषालिककंटा: द्विज: (ज्ञेया:) ततः नृपाः [क्षत्रिया:| ततः विशः [विश्या:] ततः अंध्रिजा: [शूद्रा:] । बरस्य वर्णत: अधिका वधू: बुधे: न शस्यते ॥। २२॥ मीन, वृश्चिक, कक ये तीन राशियाँ ब्राह्मणसंज्षक; मेष, धनु, सिह, ये तीन क्षत्रियसंज्ञक; वृष, मकर, कन्या, ये तीन वेश्यसंज्षक और मिथुन, कुम्भ, तुला, ये तीन शुद्गसंज्ञक हैं । इन चारों में पहिले से दूसरा, दूसरे से तीसरा और तीसरे से चौथा वर्ण नीच है। यदि वर की जन्मराश्षि के वर्ण से कन्या की जन्मराशि का वर्ण श्रेष्ठ होतो उस कन्या के साथ उस वर का विवाह न करना चाहिए। ब्राह्मणवर्ण कन्या और क्षत्रियादि वर्ण वर हो तो उनका परस्पर विवाह योग्य नहीं होता ॥ २२ ॥

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