। किसी का विवाह होने के बाद छः महीने के भीतर उसी कुल में तीन पीढ़ी के अन्दर किसी का मुण्डन और यज्ञोपवीत शुभ नहीं होता । तथा किसी का मुण्डन किसी का यज्ञोपवीत होने के बाद छः महीने के भीतर शुभ नहीं होता तथा वधू-प्रवेश होने केबाद छः महीने के भीतर किसी का विवाह शुभ नहीं होता । यदि आवश्यक हो तो संवत्सर के भेद से छः महीने के भीतर भी करना चाहिए। यथा माघ में किसी का विवाह हुआ हो #याज्ञवल्क्य-संहिता में कही हुई गणेश को पूजा । | विवाह प्रकरण १०७ और संवत्सर बदलने के बाद वेशाख में उसी कुल में किसी का मुण्डन या यज्ञोपवीत हो तो वह शुभ है। ऐसे ही उक्त संपूर्ण विषयों में जानना चाहिए ॥ १५॥। दुष्ट नक्षत्रों में उत्पन्न बवर-कस्या का फल दइवश्विनाशमहिजा सुतरां विधत्तः कन्यासुतो निऋतिजो ब्वशुरं हतश्च । स्वधवाग्रज॑ च ज्येष्ठााभजाततनया शक्राग्निजा भवति देवरनाहशकत्रीों ॥ १९॥। दीशाहपादत्रयजा कन्या देवरसोौख्यदा । मुलान्त्यपादसार्पाद्यपादजातो तयोः शुभों ॥ २०॥ अन्वयः--अहिजौ कन्यासुतौ सुतरां श्वश्रविनाशं विधत्त:., च निऋतिजोौ कन्यासुतो एवश्रं हतः, ज्येष्ठाभजाततनया स्वधवाग्रजं॑ (हन्ति ), शक्राग्निजा देव रना शकर्त्री भवति ॥ १६ || द्वीशाद्यपादत्रयजा कन्या देवरसौंख्यदा, मूलान्त्यपादसर्पाद्यपादजातौ तयो: (श्वश्रृश्वशुरयो:) शुभो ।। २० ॥ आइ्लेषा में उत्पन्न वर वा कन्या सासु का, मूल नक्षत्र में उत्पन्न कन्या वा वर इवशुर का, ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने पति के बड़े भाई का और विशाखा में उत्पन्न कन्या अपने पंति के छोटे भाई का नाश करती है ॥ १९॥
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