अन्वयः--विश्वस्वातीवेष्णवपूर्वात्तियमैत्रें: वस्वाग्नेये: वा करपीडोचितऋ्षे: हि (निश्चयेन) आदौ वस्त्रालंकारादिसमेते: फलपुष्पै: (कन्यां) संतोष्य अनु कन्यावरणं स्यात ।। १० ।। उत्तराषाढ़, स्वाती, श्रवण, तीनों पूर्वा, अनुराधा, धनिष्ठा वा कृत्तिका नक्षत्र में, अथवा विवाहोक्त नक्षत्रादि में, वस्त्र, आभूषण अथवा फल॑, फूल आदि से कन्या को संतुष्ट करके फिर उसका वरण करे || १०॥ वरवरण अर्थात् फलदान का मुहत्तं धरणिदेवो5थवा कन्यकासोदर: शुभदिने गीतवाद्यादिशि: संयुतः । वरव्ति वस्त्रयज्ञोपवीतादिना श्रुवयुतवत्निपूर्वात्रयराचरेत् ॥ १११ अन्वयः--शुभदिने श्रुवयुतेः व्निपूर्वातयै: धरणिदेव: अथवा कन्यकासोदर : गीत- वाद्यादिभि: संयुतः सन्, वस्त्रयज्ञोपवीतादिना वरवृति आचरेत्॥॥ ११॥ रोहिणी, तीनों उत्तरा, क्ृत्तिका और तीनों पूर्वा नक्षत्र, शुभ दिन, तिथि, लग्नादि में गीत-वाद्य आदि के साथ ब्राह्मण अथवा कन्या का. भाई वस्त्र, यज्ञोपवीत, द्रव्य, फल, फूलादि से वर का वरण करे ॥ ११॥
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