Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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अन्वयः--प्रश्नलग्नक्षण शंखभेरीविपञ्ची रब:मज्भलं जायते ।वायसः वा खर: श्वा श्रुगाल: अपि यदि रौति वा नादं करोति तदा वैपरीत्यं लक्षयेत् ॥| &॥ यदि प्रइनकाल में अकस्मात् शंख, तुरही वां वीणा का शब्द सुन पड़े तो वर-कन्या का मंगल होता है, और यदि कौआ, गदहा, कुत्ता वा सियार शब्द करने लगें तो उससे विपरीत अर्थात् अमंगल होता है ।। ९॥ कन्यावरण-सुह॒त्तं विश्वस्वाती वष्णवपूर्वात्रयमैत्रेवस्वाग्नेये्वा करपीडोचितऋत्षे: । वस्त्रालडूग़रादिसमेत: फलपुष्पः सन्तोष्यादो स्यादनु कन्यावरणं हि ॥ १०॥
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