। १०४ मुहत्तंचिन्तामणि विवाहकाल में ग्रहशुद्धि गुरुशुद्धिशेन कन्यकानां समवर्षेषबु षडब्दकोपरिष्टात्। रविशुद्धिवज्ाच्छुभो वराणामुभयोव्चन्द्रविशुद्धितों बिवाह: ॥ १२॥ अन्वयः--कन्यकानां षडब्दकोपरिष्टात, समवर्षषु गुरुशुद्धिवशेन, तथा वराणां रविशद्धिवशात्, तंथा उभयो: चन्द्रविशुद्धित: विवाह: (शुभः:) स्थात् ॥ १२॥ गुरुजुुद्धिवश से अर्थात् कन्या की जन्मराशि से नवें, पाँचवें, दूसरे, सातवें वा गेरहवें स्थान में बृहस्पति के रहते, छ: वर्ष सेऊपर समवर्ष में अर्थात् आठवें या दशवें वर्ष में कन्याओं का, और सूर्यशुद्धिवश से अर्थात् वर की जन्मराशि से तीसरे, छठे, दशवें वा गेरहवें स्थान में सूर्य केरहते, विषमवर्ष में अर्थात् नवें, गेरहवें, तेरहवें इत्यादि वर्षों मेंवरका, और चन्द्रविशुद्धिवश से अर्थात् वर और कन्या की जन्मराशि से पहिले चौथे, आठवें, बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में चन्द्रमा केरहते वर और कन्या का विवाह हुभ होता है ॥ १२ ॥
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