। क् लखनऊ का लग्नसमान लिन वृष मिथुन |कके | सिंह जल |कन्या गा न धनु मिनिट |मकर | कुम्भ |5 मीन २१५|२११ |३०३|३४३ [३५७|३८ |३३८| ३४७ |३४५३ |३०३ |२४१ |२१५ इष्टकाल बनाने की विद्वष रीति चेललग्नाकौ सायनावेकराशौ तह्िश्लेषघ्नोदयः खाग्निभक्तः । स्वेष्ट: कालो लग्नमूनं यदार्काद्राशौ शेषोईर्कात्सबड़भं॑निशायाम् ॥ १०६॥ अन्वयः--चेत् सायनो लग्नाकी एकराशौ (तदा) तद्विश्लेषष्नोदय: खाग्निभक्त: स्वेष्ट: काल: (स्यात्), यदा लग्नं अर्कात् ऊंनं (तदा) रात्रे: शेष: स्यात् तथा, निशायां सषडभात् अर्कात् ॥ १०६ ॥। मुह॒त्तंचिन्तामणि १५६ यदि अयनांशयुक्त लग्न और अयनांशयुक्त सूर्य दोनों एक ही राशि में हों तो दोनों केआपस में घटने पर शेष से गुणी हुई अपने देश की उदय में तीस का भाग देने से जो लब्ध हो, वह सूर्योदय से लेकर इष्टकाल होता है। यदि सायन लग्न तथा सूर्य ये दोनों एक ही राशि में स्थित हों और सूये के अंशों सेलग्न के अंश कम हों तो उन कम अंशों से गुणी हुई अपने देश की उदय में तीस का भाग देने से जो लब्ध हो बह सूर्योदय सें पूर्व रात्रि काबाकी काल होता है। इसको साठ में घटाने सेशेष पूर्व दिन के सूर्योदय से लेकर इष्टकाल होता है। रात्रि में सूर्य की राशि में छः जोड़कर उक्त रीति करने पर इष्टकाल स्पष्ट होता है। एक राशि में स्थित सूर्य सेअधिक लग्त का उदाहरण--यथा ९। २५। ६। ३६ इस ०।5८॥।॥७॥ १० ९। १६। ५९। २६ सूर्य को घटाया तो लग्न में दोष रहे । इन शेष अंकों को लग्न तथा सूर्य के मकरराशि में रहने के कारण मकर की ३०३ उदय से ग्रुण दिया, तो २४६० । ११॥। ३० हुए । इनमें तीस का भाग दिया तो 5२ | २२। १ पलादि लब्ध हुए । सूर्योदय सेलेकर यही इष्टकाल हुआ। कम लग्न का उदाहरण-यथा ९।२६। ५० । ४० सूर्य में ९।२२।४५। ३६ लग्न को घटाया तो ० । ४ । ५। ४ शेष रहे। इनको मकर की स्वदेशी ३०३ उदय से गुण दिया तो २२३५ । ३५ । १२ हुए । इनमें तीस का भाग दिया तो ४१। १५। १० पलादि लब्ध हुए। सूर्योदय से पूर्व इतना रात्रिशेष हुआ । इसको साठ में घटाया तो ५९ । १८ । ४४ । ५० दण्डादि शेष रहे । यही इष्टकाल हुआ । रात्रि में इष्टकाल का उदाहरण तो पूर्व इलोक में कहे हुए उदाहरण के सायन सूय में छः राशि जोड़कर उक्त क्रिया करने से हो जायगा, इसलिये यहाँ नहीं कहा ॥ १०६ ॥
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