Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 105
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः-तनो: इष्टांशकात्‌ पूर्व नवांशा: दशसंगृणा: रामाप्ता: लब्धं वर्गादिसाधने तनो: अंशाद्यं (स्यात्‌) ॥| १०४ ॥ विवाहादि शुभ कार्य के लिए जिस बली शुभ लग्न का जो दोषरहित विहित नवांश विचारा गया हो उससे पूर्व जितने नवांश उस लग्न के हों उनकी संख्या कोदश से गुणाकर तीत का भाग देने से जो कुछ लब्ध हों वही उस लग्न के तात्कालिक भुक्त अंश-कला आदि होंगे और वही उस | । द लग्न के गृह होरा द्रेष्काणादि पूर्वोक्त षड्वर्गंसांधन में काम आते हैं । उदाहरण--तथा मिथुन लग्न का सातवाँ नवांश शुद्ध विचारा गया तो द द उससे पूर्व नवांशों की छः संख्या को दश से गुणा तो सांठ हुए। इनमें तीन का भाग देने से २० | ०० लब्ध हुए। यही मिथुन लग्न के भुक्तांशादि होंगे | १०४ ॥ ट लग्न और सूर्य से इष्टकाल साधन अर्काल्लग्नात्‌ सायना:ड्रोग्यभुक्ते- द द का 'भगिनिध्नात्‌ स्वोदयात्‌ खाग्निभक्तात । | द भोग्यं भुक्त चान्तरालोदयादच्ं षष्टया भक्त स्वेष्टनाड्यो भवेयुः॥ १०५॥ अन्वयः--सायनात्‌ अर्कात्‌ लग्नात्‌ भोग्यभुक्ते: भागे: निष्नात्‌ स्वोदयात्‌ खार्नि- भक्‍तात्‌ भोग्यं भुक्‍त॑ (तत्‌) अन्तरालौंदोढंयं षष्टया भक्‍तं तदा स्वेष्टनाड्य: भवेयू: | १०५॥ अयनांशसंयुक्त तात्कालिक सूर्य के भोग्य अंशों सेऔर अयनांशसंयुक्त तात्कालिक लग्न के भुक्त अंशों से गुणे हुए अपने देश के मेषादि लग्नों के मान में तीस का भाग देने से लब्ध हुआ सूर्य का भोग्य अर्थात्‌ भोग करने के लिए बाकी, और लग्न का भृक्त, अर्थात्‌ भोग किया हुआ पलात्मक काल होता है । इन दोनों को तथा सूर्य और लग्न के मध्य लग्नों के 'पलात्मक प्रमाण को | न्‍् विवाह प्रकरण १५५ जोड़कर उसमें साठ का भाग देने से लब्ध हुए इष्टकालिक दण्ड पल होते हैं। उदाहरण--यथा शाके १८१४ माघ कृष्ण दशमी बृहस्पतिवार को २५ दण्ड ६ पल तात्कालिक सूर्य के ९। ३। १३ ॥ ०० स्पष्ट में अयनांश जोड़ने से ९।२६। ३। ०० यह सूर्य का सायन स्पष्ट हुआ। इसके २६। ३ । ०० अंशादि को ३० अंझों में घटाने पर शेष ३। ५७ । ०० सूर्य के भोग्य अंशादि हुए। मकरराशि में रहने के कारण सूर्य के ३। ५७ | ०० भोग्य अंशों सेलखनऊ की ३०३ पलात्मक मकरोदय प्रमाण को गुणने पर ११९६। ५१ । ०० पलादि हुए। इनमें ३० तीस का भाग देने से ५३ लब्ध सायन सूर्य के भोग्य पलादि हुए । ऐसे ही तात्कालिक ४० । ०० लग्न में २२। ५० अयनांश जोड़ने ३९। २। २६ । से ३। १९।३०। ०० सायन लग्न हुई । ककराशि होने केकारण इसके १९। ३० । ०० भक्तांशों से लखनऊ की पलात्मक ३४३ कर्कोदय प्रमाण को गुणने से ६६८८ | ३० । ०० पलादि हुए। इनमें ३० का भाग देने से २२२। ५७ लब्ध सायन लग्न के भुक्त पलादि हुए। सूर्य के ३९। ५३ भोग्य और लग्न के २२२ । ५७ भुक्त पलों कोतथा मकर और कक॑ के मध्य की कुम्भ के २५१, मीन के २१८, मेष के २१८, वृष के २५१, मिथुन के ३०३ पलात्मक प्रमाणों को जोड़ने से १५०४ पल हुए। इनमें साठ का भाग देने से २५। ४ लब्ध दृष्ट दण्ड हुए । वहाँ सूर्यादि प्रतिविकलादि छटने के कारण इष्ट में दो पलों का भेद हुआ है ॥ १०५॥

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