Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 5 · · Verse 8
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

जीवार्का रदिने मृगेज्यनिऋतिश्रोत्रादितिब्रध्नभ रिक्तामाक रसाष्टव्ज्यंतिथिभिर्मासाधिपे. पीवरे । सीमन्तो5ष्टमषष्ठमासि ज्ञभदः केन्द्रश्रिकोण खललभिारित्रिषु वा श्र॒ुवान्त्यसदहे लग्ने च पुंभांशकें ॥ ८॥ अन्वयः -जीवार्का रदिने मृगेज्यनिऋतिश्रोत्नादितिब्रध्नभे:, रिक्तामाक रसाष्टवर्ज्य॑तिथिभि मासाधिपे पीवरे, अष्टमषष्ठमासि, शुभदे: (शभग्रहै:) केन्द्रत्निकोणे, खले: (पापग्रहैः) लाभारित्रियु (स्थिते:) वा ध्रवान्त्यसदहें, पूुंभांशके लग्ने सीमनन्‍्तः शभ: ।। ८ ॥ बृहस्पति, रविवार और मंगलवार में, मृगशिरा, पुष्य, मूल, श्रवण, पुनर्वंसु और हस्त नक्षत्रों में; चौथि, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या, द्वादशी, छठि और अष्टमी को छोड़ अन्य तिथियों में; मासेश्वर' के बली रहते, गर्भाधान से आठवें या छठे मास में; केन्द्रत्रिकोण अर्थात्‌ लग्न, चौथा, सातवाँ, दशवाँ, नवाँ, पाँचवाँ इन स्थानों में शुभग्रहों केरहते; गेरहवें, छठे, तीसरे स्थान में ऋ्रग्रहों केरहते और पुरुषसंज्ञक ग्रहों केलग्न वा नवांश के सीमन्तोन्नयन कर्म श्रेष्ठ है। अथवां तीनों उत्तरा, रोहिणी और रेबती इन नक्षत्रों मेंऔर चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति, शुक्र, इन ग्रहों केवासर में और दोपहर से पूर्व शुक्लपक्ष में सीमन्तोन्नयन कर्म करना श्रेष्ठ है। छठे, आठवें मास होने के कारण इनमें गुरुशुक्रास्तादि का विचार कम किया जाता है ॥। ८॥।

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