Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
अन्वयः--शुभै: केन्द्रतिकोणेषु (स्थिते:) पाप: तयायारिगे: पुड् ग्रहदृष्टलग्ने अब्ज ओजांशगे च यग्मरात्रौ (गर्भाधानं शुभम्), च (पुनः ) चित्रादितीज्याश्विष (नक्षत्रेष) मध्यमं स्थात् ।। ७ ।। पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, नवें और पाँचवें स्थान में शुभग्रह स्थित हों; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह हों; सूर्य, मंगल वा बृहस्पति लग्न को देखते हों; विषम राशि वा विषम नवांश में चन्द्रमा स्थित हो, ऐसे लग्न में और रजोदशेन के बाद चौथी, छठी, आठवीं, दशवीं, बारहवीं, चौदहवीं, सोलहवीं रात्रि में गर्भाधान शुभ होता है। चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य और अदिवनी नक्षत्र में गर्भाधान मध्यम फलदायक होता है ।। ७॥।
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