Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 5 · · Verse 58
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

नान्‍दीश्षाद्वार मातुः पुष्पे लग्नान्तरे न हि। शान्त्या चौलं ब्रतं पाणिग्रहः कार्योबन्‍्यथा न सत्‌ ॥ ५८॥ अन्वयः--तान्दीक्षाद्धोत्तरं मातुः पुष्पे सति, (अग्रे) लग्नान्तरे नहि (प्राप्तेसति) शान्त्वा चौलं ब्रतं (कार्यम्‌) विवाहः (कार्य:) अन्यथा न सत्‌ | ५८ ॥। नान्दीश्राद्ध होने केपश्चात्‌ जिसकी माता रजस्वला हो उस लड़के का मुण्डन, यज्ञोपवीत वा विवाह पूर्व विचारे हुए मुह॒त्तं कोछोड़ उसी के समीप दूसरे मुहत्त मेंकरना चाहिए। यदि दंवयोग से पूर्व विचारे हुए मुह॒त्तं के समीप दूसरा शुभ मुहत्ते न मिले तो धर्मंशास्त्र में कही हुई शान्ति करके उसी मुहर्त्त मेंकरे। किन्तु विना शान्ति किये यदि उक्त कर्म किये जाते हैं, तो शुभ नहीं होता ॥ ५५॥

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse