वेदक्रमाच्छशिक्षिवाहिक रत्रिमु लपूर्वासु पौष्णक रमैत्रमृगादिती ज्ये। भ्रोवेषु चाश्विवसुपुष्यकरोत्तरेशकर्ण मृगान्त्यलघ्मैत्रथनादितो सत् ।। ५७ ॥। अन्वयः--शशिशिवाहिक रत्तिमूलपूर्वासु, पौष्णक रमैत्रमू गांदितीज्ये च ध्रौवेष, अश्विवसुपुष्यकरोत्तरेशकर्णे, मृगान्त्यलघुमैत्रधनादितौ, वेदक्रमात् ब्रतं सत् स्थात् ।। ५७ ॥ मृगशिरा, आर्द्रा, आश्लेषा, हस्त, चित्रा, स्वाती, मूल और तीनों पूर्वा में ऋग्वेदाध्यायियों का; रेवती, हस्त, अनुराधा, मृगशिरा, पुनर्व॑सु, पुष्य, रोहिणी और तीनों उत्तरा में यजुर्वेदाध्यायियों का; अद्विनी, धनिष्ठा, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, आर्द्रो और श्रवण नक्षत्र में सामवेदाध्यायियों का तथा मृगशिरा, रेवती, पुष्य, अश्विनी, हस्त, अनुराधा, धनिष्ठा और पुनवंसु नक्षत्र में अथवंणवेदाध्यायियों का यज्ञोपवीत शुभ होता है ।| ५७ ॥।
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.