Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 5 · · Verse 56
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

प्राग्‌ ब्रह्मौदनपाकाद क्तबन्धानन्तरं यदि चेत्‌ । उत्पातानध्ययनोत्पत्तावपि श्ञान्तिपूर्वेकं तत्स्यात्‌ ॥ ५६१४ अन्बयः--त्र तबन्धानन्तरं, ब्रह्मौदनपाकात्‌ प्राग यदि चेत उत्पातानध्ययनोत्पत्तौ अपि शान्तिपुरवंकं तत्‌ (ब्रह्मौदनं )स्थात्‌ ॥| ५६ ।। विधिपूर्वक यज्ञोपवीत होने के पश्चात्‌ और सायंकाल में होनेवाले ब्रह्मौदन कर्म के पूर्व यदि अकस्मात्‌ कोई उत्पातविशेष या अनध्याय हो तो वह उस लड़के के पढ़ने में विध्चकारक होता है। इसलिए पहिले उसकी शान्ति करके तब ब्रह्मगौदन कर्म करे और यदि यज्ञोपवीत के पहिले अकस्मात्‌ कोई उत्पात हो तो यज्ञोपवीत ही न करे। ब्रह्मौदन कर्म बह्वचों के यहाँ होता है ॥ ५६ ॥।

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse