Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 5 · · Verse 55
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अकंतकं त्रितिथिषु॒प्रदोषः: स्थात्तदगप्रिमेः । राज्यधंसाधंप्रहरयाममध्ये स्थित: कऋरमात्‌ ॥ ५५॥ अन्वयः--अकंतकंत्रितिथिष स्यात्‌ ॥ ५५ ॥। रात्यध॑साधंप्रहरथाममध्ये स्थिते: तदग्रिमै: प्रदोष द्वादशी में आधी रात से पूर्व ही यदि त्रयोदशी का योग हो तो वह प्रदोष, छठि में डेढ़ पहर रात बीतने के पूर्व हीयदि सप्तमी का योग हो तो वह प्रदोष और तीज में पहर भर रात बीतने के पूर्व हीयदि चौथ का योग हो तो वह प्रदोष कहा जाता है ॥ ५५॥

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