Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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विद्यानिरतः शुभराशिलवे पापांशगते हि दरिद्रतरः। चन्द्रे स्वलवे बहुदुःखयुतः कर्णादितिभे धनवान्स्वलवे ॥ ५० 0 अस्वयः--शुभराशिलवे चन्द्रे ब्रती विद्यानिरतः स्यात्। पापांशगते दरिद्वतर: स्यात्। स्वलवे चन्द्रे बहुदुःखयुतः स्यात्। स्वलवे चन्द्र कर्णादितिभ धनवान् भवत्ति ॥| ५० ।। यज्ञोपवीत में यदि चन्द्रमा शुभराशि के नवांश में स्थित हो तो ब्रती अर्थात् जिसका ग्रज्ञोपवीत करना है वह बालक सदा विद्या में रुचि रखनेवाला और पापराशि के नवांश में स्थित हो तो अतिशय दरिद्र तथा अपनी राशि के नवांश में अर्थात् ककंराशि के नवांश में बहुत दुःखों से संयुक्त होता है। यदि यज्ञोपवीतकाल में चन्द्रमा ककंराशि के नवांश में होऔर श्रवण नक्षत्र या पुनर्वंसु नक्षत्र हो तोवह बालक धनवान होता है ॥| ५० ॥।
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