Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi
क्रो जडो भवेत्पाप: पट: षटकमकृद्वटुः । यज्ञा्थंभाक् तथा मूर्खो रव्याद्यंशे तनो ऋमात् ॥| ४९॥। अन्वयः--रव्याद्यश तनौ सति वट्: क्रमात, क्रः, जडः, पापः, पटु:, षटकमंक#त्, यज्ञार्थंभाकू, तथा मूर्ख: स्थात् ॥| ४४८ ॥।। सूर्य के नवांश+ में यज्ञोपवीत करने से वह बालक क्रूर अर्थात् निर्देय, चन्द्रमा के नवांश में करने से जड़ अर्थात् विचाररहित, मज्ठल के नवांश में पापी, बुध के नवांश में पटु अर्थात् चतुर, बृहस्पति के नवांश में यज्ञ करना-कराना, दान लेना-देना, पढ़ना-पढ़ाना, ये छः कर्म करनेवाला, शुक्र के नवांश में यज्ञ करनेवाला और धनी तथा शनं₹चर के नवांश में यज्ञोपवीत करने से मूर्ख होता है। इसलिए लग्न में शुभग्रह का नवांश हो तब यज्ञोपवीत उत्तम होता है ॥ ४९ ॥
Have a question about this verse?
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.