Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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ब्रतबन्धे5ष्टघड्रिष्फर्वाजता: शोभनाः शुभा: । त्रिषडाये खलाः पूर्णो गोककंस्थो विधुस्तनों ॥॥| ४२॥। अन्वयः--शुभा: [शुभग्रहा:] अष्टषडरिष्फबर्जिता: ब्रतबन्धे शोभना: भवन्ति । तथा खला: त्रिषडाये, शोभना: भवन्तनि। पूर्ण: विधु: गोककंस्थ: तनोौ मृतौ शोभनों भवति ॥।| ४२ ॥। यज्ञोपवीत में लग्न से आठवें, छठे वा बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में शुभग्रह स्थित हों और तीसरे छठे वा गेरहवें स्थान में पापग्रह स्थित हों तो शुभ होते हैं । वृष वा कर्क राशि में स्थित पूर्ण चन्द्रमा यदि लग्न में हो तो शुभ होता है ॥ ४२ ॥।
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