Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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अन्वयः--क्षौरभेतथा पञ्चमे पञ्चमे दिने वा अस्य (नक्षत्रस्य )उदये (मुह॒त्तें) नृपाणां श्मश्रुकम हितम् । तथा षडगिनि: त्रिमैत्रः, अष्टक:, पञ्चपित्य:, अब्ध्ययेमा, क्षौरकृत अब्दत: मृत्यूं एति ॥ ३६ ।। साधारण क्षौरकर्म के लिए कहे हुए नक्षत्रों में पाँचवें दिन दाढ़ी केबाल बनवाना राजाओं का हितकारक होता है । अब सव्ंथा क्षौर में त्याज्य नक्षत्र कहते हैं। कृत्तिका नक्षत्र में छः बार, अनुराधा में तीन बार, रोहिणी में आठ बार, मधा में पाँच बार, उत्तराफाल्गुनी में चार बार बाल बनवाने वाला पुरुष एक वर्ष के अनन्तर मृत्यु को प्राप्त होता है।। ३६॥।
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