Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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ऋतुपाणिपीडमृतिबन्धमोक्षण क्षुरकर्म च द्विजनुपाज्ञयाचरेत् । शववाहतीथंगमससिन्धुमज्जनक्ष्रमाचरेन्न खलु गर्भिणीपतिः ॥ ३५॥ <अन्वयः--क्रेतुपाणिपीड्मृतिबन्धमोक्षणे ट्विजनपाज्ञया क्षुरकर्म. आचरेत् । खलू गर्भिणीपति:, शववाहतीर्थंगमसिन्धुमज्जनक्ष्रं न आचरेत् ॥| ३५॥। यज्ञ में, विवाह में, माता-पिता के मरण में, बन्धन से छटने पर अथवा ब्राह्मण वा राजा की आज्ञा से सदा बाल बनवावे; चाहे निषिद्ध भी वारादि हो तो भी कुछ दोष नहीं । अब गर्िणीपति के त्याज्य कर्म कहते हैं। शव का ले जाना, तीथयात्रा, समुद्र में स्नान और क्षौरकर्म जिसकी स्त्री गर्भवती हो वह पुरुष इतने कर्म न करे ॥ ३५॥।
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