Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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ऋतुमत्या: सुृतिकाया: सुनोश्चौलादि नाचरेत् १ ज्येष्ठापत्यस्य न ज्येष्ठे कश्चिनमार्गंडपि नेष्यते ॥ ३३ ॥ अन्वयः--ऋतुमत्या: सूतिकाया: सूनों: चौंलादि न आचरेत् । ज्येष्ठापत्यस्य ज्येष्ठे चौलं न आचरेत् । कंश्चित् मार्गेषपि न इष्यते ॥ ३३ ॥। जब माता रजस्वला हो, अथवा माता के लड़की हुए महीने से कम अथवा लड़का हुए बीस दिन से कम दिन बीते हों तो लड़के का मुण्डनादि संस्कार न करे । जेठे लड़के और जेठी लड़की का ज्येष्ठ महीने में विवाहादि शुभ कार्य न करे । कोई आचाये अगहन में भी जेठे लड़के और लड़की के विवाहादि संस्कार को निषिद्ध कहते हैं ॥ ३३ ॥।
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