तारादौष्टच्रे<ब्जे त्रिकोणोच्चगे वा क्षौरं सत्स्यात्सौम्यमित्रस्ववर्ग । सौस्ये भेडब्जे शोभने दुष्टतारा हास्ता ज्ञेया क्षौरयात्रादिकृत्ये ॥ ३२ ॥ अन्वयः--तारादौष्टचे (अपि) (चन्द्रे) त्रिकोणोच्चगे वा सोम्यमित्रस्ववर्गे (स्थिते) क्षौरं सत् स्थात् ।शोभने अब्जे सौम्ये भे (सति) क्षौरयात्रादिकृत्ये दुष्टतारापि शस्ता ज्ञेगा ॥ ३२॥ यंदि तारा दुष्ट भी हो, अर्थात् पहिली, तीसरी, पाँचवीं, सातवीं भी हो और चन्द्रमा नवें या पाँचवें या अपने उच्चस्थान में, अथवा बुध, बृहस्पति, शुक्र केषड़वर्ग में, अथवा अपने ही षड़्वर्ग में स्थित हो तो मुण्डन शुभ होता है। विहित शुभ नक्षत्र हों, चन्द्रमा गोचर से शुभ हो, अर्थात् जन्मराशि से चौथे, छठे, आठवें, बारहवें स्थान को छोड अन्य स्थान में स्थित हो तो दुष्ट भी तारा मुण्डन और यात्रा आदि में शुभ हो जाती है ॥। ३२॥।
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