मासे चेत्प्रथमे भवेत्सदशनो बालो विन्येत्स्वयं हन्यात्संक्रमतो5नुजातभगिनीं मात्रग्रजान द्च्चादिके । षष्ठादो लभते हि भोगमतुल तातात्सुखं पुष्टतां लक्ष्मों सोख्यमथों जनो सदहनो वोध्व॑ स्वपित्रादिहा ॥ १३॥ अन्वयः--चेत् [यदि] प्रथमे मासे ब्राल: सदशनः भवेत् (तदा स: स्वयं नश्येत् । द्यादिके मासे (चेत् संदशनः ) तदा क्रमतः अनुजातभगिनीमात्रग्रजान् हन्यात् । 'षष्ठाद (क्रमेण) अतुल भोगं, तातात् सुखं, पुष्टतां, लक्ष्मी, सौख्य लभते । अथो जन्मसमये सदशनः (बालः) स्वपित्नादिहा (भवति) वा ऊध्व (ऊध्वंपंक्तो) सदशन: बाल: स्वपित्रादिहा (भवति) ॥| १३ ॥। पहिले मास में यदि बालक के दाँत निकलें तो वह् बालक मर जाता है। यदि दूसरे मास में निकलें तो छोटे भाई को, तीसरे मास में निकलें तो बहिन को, चौथे मास में जामें तो माता को और पाँचवें मास में जामें तो जेठे भाई को मारता है। यदि छठे मास में दाँत जामें तो वह बालक उत्तम भोग, सातवें मास में जामें तो पिता से सुख, आठवें मास में जामें तो देह की पुष्टता, नवें मास में जामें तो लक्ष्मी, दशवें मास में जामें तो सौख्य, गेरहवें मास में जामें तोअतिसौख्य और बारहवें मास में धन-सम्पत्ति को प्राप्त होता है । यदि गर्भ ही में जामे हुए दातों के सहित उत्पन्न हो, अथवा ऊपर की पंक्ति में पहिले दाँत जामें तोवह बालक अपने माता-पिता, भाई इत्यादिकों का विनाश करता है ॥ १३॥।
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