Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 5 · · Verse 11
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

तज्जातकर्मादि शिशोविधेयं पर्वाख्यरिक्तोनतिथों शुभेषज्नि । एकादश द्वादशके5षपि घने मृदुश्रुवक्षिप्रचरोड्षुं स्थात्‌ ॥ ११॥ अन्वयः--पवख्यरिक्तोनतिथौ, शुभेक्नि, एकादशे अपि द्वादशंके घंस्रे, मृदुश्रुव-क्षिप्रचरेष शिशो: ततं जातकर्मादि विधेयं स्थात ॥| ११॥। पर्व अर्थात्‌ क्ृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पौर्णमासी, सूर्य-संक्रान्ति तथा चौथि, नवमी और चतुर्दशी को छोड़ अन्य तिथियों में व्यतीपातादि दोषरहित शुभग्रहों केदिन में; जन्मकाल से गेरहवें वा बारहवें दिन में; मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, हस्त अधिविनी, पुष्य, अभिजित्‌, स्वाती,पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिष नक्षत्र में जातकर्म करे यदि जन्मकाल में किसी कारणवश न किया गया हो । आदि पद से नामक का भी ग्रहण है, अर्थात्‌ इसी मुह॒र्त्त में नामकर्म भीकरना चाहिए ॥ ११॥।

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