Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
॥ अन्वयः--संक्रान्तिधिष्ण्याध रधिष्ण्यत: त्रिभे स्वभे गमनं निरुक््तम्, ततः अद्ुभे सुखम्, (ततः) त्विभे पीडनम्, (ततः ) अद्भुभे अंशकम्, (ततः) त्रिभे अथेहानि:, (ततः) रसभे धनागम: (स्थात् ) ॥| १८ ।। संक्रान्ति जिस नक्षत्र में हो उसके पूर्वनक्षत्र से जन्मनक्षत्र तक गिने । यदि प्रथम तीन नक्षत्रों में सेजन्मनक्षत्र हो तो कहीं जाना पड़े, चौथे से लेकर छ: नक्षत्रों में हो तोसुख, दशवोें से लेकर तीन नक्षत्रों में शरीरपीड़ा, तेरहवें सेलेकर छ;: नक्षत्रों में वस्त्र की प्राप्ति, उन्नीसंवें सेलेकर तीन नक्षत्रों में द्रव्यादि कीहानि और बाइसवें से लेकर छ: नक्षत्रों मेंधन की प्राप्ति होती है ।। १८ ॥।
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