अंन्वयः--बवतः [बवमारभ्य | रखे: संक्रम (सति) (क्रमात) सिंहव्याप्रवराहरासभगजा: द्विषद्घोटका: श्वा अजः गौः:चरणायूधः: (एते) वाहा: (ज्ञेया:), (तथा) श्वेतसुपीतहा रितकपाण्ड रक्तकालासितं- चित्र कम्बलदिग्घनाभं [एतद्वस्त्र ज्ञेयं |, भुशण्डी गदा-खज्भः दण्डशरासतोमरं अथो कुन्तः पाश: अंकुश: अस्त्रं बाण: (एतत् ) शस्त्र स्थांतू, अथ अन्नपरमाच्नंभक्ष्यपक्वान्नकम् दुग्धं, दधि-अपि (तथा) चित्षितान्नगुडमध्वाज्य तथा शकरा (एतत्) भक्ष्यं (ज्ञेयम्), अथ मृगनाभिकुडकुमं अथो पाटीरमृद्रोचनम् याव: च (पुनः) ओतुमद: निशाञजनं अथ कालाभुरु: चन्द्रकः (एषः) लेप:, (तथा) देवतभतसर्पंविहंगा: पश्वेणविप्रा: ततः: क्षत्रियवश्यकश्द्रसंकरभवाः [एषा| जाति: (ज्ञेया), च (पुनः) पुन्नागक जातोबाकुलकेतकानि च (तथा) विल्वाकंदर्वाम्बुज मल्लिका पाटलिका च (पुनः) जपा (एतत) पुष्पं स्थातू, च (पुनः) संक्रांतिवस्त्रासन-वाहनादे: तद्वृत्त्यपजीबिनां च नाश: (स्यात्), च (तथा) स्थितोपविष्टस्वपतां नाश: (स्यात् )॥ १४-१७ ।। बवादि सात चर और शकुनि आदि चार स्थिर मिलकर ग्यारह करणों में होनेवाली सूर्य संक्रान्तियों केक्रम से सिंहादि वाहन, इ्वेतादि वस्त्र, .भुशुण्डी आदि आयुध, अन्नादि भ्रक्ष्य, कस्तूरी आदि लेपन, देवतादि जाति और पुन्नागादि पुष्प होते हैं। बव करण में होनेवाली संक्रान्ति सिंह पर सवार, इवेतवस्त्र धारण किये, भुशुण्डी हाथ में लिये, अन्न का भक्षण करती हुई, कस्तूरी का लेप देह में लगाये, देवताजातिवाली, नागकेसर का फूल हाथ में लिये होती है। बालव करण में होनेवाली संक्रान्ति व्याध्र पर सवार, पीले वस्त्र धारण किये, गदा हाथ में लिये, खीर भक्षण करती हुई, कुंकुम का लेप देह में. लगाये, . भूतजातिवाली, चमेली का फूल हाथ में लिये होती है। कौलव करण में होनेवाली संक्रान्ति वराह पर सवार, हरे वस्त्र धारण किये, तलवार हाथ में लिये, भीख माँगने से मिले हुए अन्नादि का भक्षण करती हुई, लाल चन्दन का लेप देह में लगाये सर्पजातिवाली, मौलसिरी का फूल हाथ में लिये होती है। तैतिल करण में होनेवाली संक्रान्ति गधे पर संवार, थोड़ा पीला वस्त्र धारण किये, दण्ड हाथ में लिये, पुआ आदि पकक्वान्न का भक्षण करती हुई,. मिट्टी का लेप देह में लगाये, पक्षीजातिवाली,.केतकी का फूल हाथ में लिये. होती है। गर करण में होनेवाली संक्रान्ति हाथी पर सव्रार, लाल बस्त्र धारण किये, धनुष हाथ में लिये, दूध का भक्षण करती हुई, गोरोचन का लेप देह में लगाये, पशुजातिवाली, बेल का फूल हाथ में लिये होती है। वणिज करण में होनेवाली संक्रान्ति भेसे पर सवार, श्याम रंग वस्त्र धारण किये, तोभर हाथ में लिये, दहीं का भक्षण करती हुई, महावर का लेप देह में लगाये, मृगजातिवाली, मदार का फूल हाथ में लिये होती है । विष्टि करण में होनेवाली संक्रान्ति घोड़े पर सवार, काला वस्त्र धारण किये, बरछी हाथ में लिये, चित्रान्न अर्थात् एक में पके हुए. चावल, मूंग, मसूर, हलदी का भक्षण करती हुई, बिलार के पसीने का लेप देह में लगाये, ब्राह्मणजातिवाली, दूब हाथ में लिये होती है। शकुनि करण में होनेवाली संक्रान्ति कुत्ते पर सवार, «अनेक रंगवाला वस्त्र धारण किये, पाश हाथ में लिये, ग्रुड-का भक्षण करती हुई, हलदी का लेप देह में लगाये, क्षत्रियजातिवाली, कमल का फूल हाथ में लिये होती है। चतुष्पद करण में होनेवाली संक्रान्ति मेढ़े परसवार, कम्बल धारण किये, अंकुश हाथ में लिये, मधु का भक्षण करती हुई, सुरमा का लेप देह में लगाये, वैश्यजातिवांली, चमेली के फल हाथ में लिये होती है। नाग करण में होनेवाली संक्रान्ति बैल पर सवार, नंगी, अस्त्र हाथ में लिये, घी का भक्षण करती हुई, अगर का लेप देह में लगाये, शूद्रजातिवाली, पाढरि का फल हाथ में लिये होती है | किस्तुष्न करण में होनेवाली संक्रान्ति चरणायुध अर्थात् मुर्गे परसवार, मेघ के समान वस्त्र धारण किये, बाण हाथ में लिये, शक्कर का भक्षण करती हुई, कपूर का लेप देह में लगाये, वर्णसंकरजातिवाली, गुड॒हर का फूल हाथ में लिये होती है । जिस महीने की संक्रान्ति के जो वाहन, बस्त्र, भक्षणादि कहे हैं, उस महीने में उन सबका नाश अथवा उन वस्तुओं से जीविका करनेवालों का नाश होता है। संक्रान्ति करते समय सूर्य की सुप्त, उपविष्ट और स्थित, ये तीन अवस्थाएँ कही हैं, उन अवस्थाओं में वंतंमान अर्थात् सोते हुए, बेठे हुए और खड़े हुए प्राणियों का भी नाश होता है ॥ १४-१७॥।
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