Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 57
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

शरेषुनेत्राश्विदरेन्दुभूकृताः । त्रिज्यदड्भपत्चाग्निकुवेदवक्कलयः वेदाग्निरुद्राश्वियमाग्निवक्लयो5ब्धयः शरतंद्विद्विरदा भतारका: ॥ ५७॥ अन्वयः--[ श्लोकक्रमेण | (एता:) भतारका: [क्रमेण ज्ञेया ] ।। ५७ ॥ अध्विनी का स्वरूप तीन ताराओं का, भरणी का तीन ताराओं का, क्त्तिका का छः ताराओं का, रोहिणी का पाँच ताराओं का, मृगशिरा का पाँच ताराओं का, आर्द्रा का एक तारा का, पुनर्वसु का चार ताराओं का, पुष्प का तीन ताराओं का, आइश्लेषा का पाँच ताराओं का, मघा का पाँच ताराओं का, पूर्वाफाल्गुनी का दो ताराओं का, उत्तराफाल्गुनी का दो ताराओं का, हस्त का पाँच ताराओं का, चित्रा का एक तारा का, स्वाती का एक तारा का, विशाखा का चार ताराओं का, अनुराधा का चार ताराओं का, ज्येष्ठा का तीन ताराओं का, मूल का गेरह ताराओं का, पूर्वाषाढ़ का दो ताराओं का, उत्तराषाढ़ का दो ताराओं का, अभिजित्‌ का तीन ताराओं का, श्रवण का तीन ताराओं का, धनिष्ठा का चार ताराओं का, दहतभिष का सौ ताराओं का, पूर्वाभाद्रपद का दो ताराओं का, उत्तराभाद्रपद का दो ताराओं का और रेवती का स्वरूप बत्तिस ताराओं का है ॥ ५७ ॥।

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