गण्डान्तेन्द्रभश लपातपरिघव्याधातगण्डा वे संक्रान्तिव्यतिपातवंधृतिसिनीबालोकु हद के । वज्ल्रे कृष्णचतु्द शीषुयमघण्टे दग्धयो रम्नृतो विष्टो सोदरभे जनिन पितृभ शस्ता शुभा जश्ञान्तितः ॥ ५६॥ अन्वयः--[ अत्नान्वयः (भवति) ॥ ५६।' श्लोकक्रमेणवान्ते)] जनिः न शस्ता,. शान्तित: शुभा गण्डान्त, ज्येष्ठा, शलयोग, पात अर्थात् गणित से सिद्ध होनेवाला व्यतीपात, परिघ, व्याघात, गण्डयोग, अवम अर्थात् तिथिक्षय, संक्रान्ति, व्यतीपात, वैधतियोग, सिनीवाली अर्थात् चतुर्दशीयुक्त अमावास्या, कुहू अर्थात् परीवासंयुक्त अमावास्या, दर्श अर्थात् सूर्य और चन्द्रमा कासमागम जिसमें हो वह तिथि, वज्ञयोग, क्रृष्णपक्ष की चतुर्दशी, यमघंट, दग्धयोग, मृत्युयोग, भद्रा, भाई-बहिन का जन्म नक्षत्र, माता-पिता का जन्मनक्षत्र, तथा चन्द्रमा और सूये के ग्रहणकाल में यदि किसी का जन्म हो, तीन कन्याओं के बाद पुत्र काजन्म और तीन पुत्रों केबाद कन्या का जन्म हो तो अशुभ होता है । परन्तु उसकी शान्ति करने से शुभ होता है ॥ ५६ ॥
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