Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
अन्वय:--शुचिप्रौष्ठपदेषमाघे मूल स्व॒र्गे (तिष्ठति) | नभः कात्तिकचेत्रपौष मूलं भूमौ (तिष्ठति) । तु (पुनः ) तपस्यमागंवेशाखशक्रष् मूलं अधस्तात् (तिष्ठति ) । मूलं (यत्र) तिष्ठति तत्न अशुभं (ज्ञेयम्) ॥| ५५॥। आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन और माघ में स्वर्ग में; श्रावण, कात्तिक, चैत्र और पौष में भूमि में; और फाल्गुन, ज्येष्ठ, अगहन और वंशाख में पाताललोक में मूल का निवास होता है। जहाँ मूल का वास होता है वहाँ उसका अशुभ होता है ॥| ५५॥
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