अन्वय:--[...] जन्मप्रत्यरिता रयो:, अब्ज मृतिसुखान्त्य कर्तु: न सत्, मैत्नभगादिति ध्रुवविशाखाद्चडप्रिभे, च ज्ञेडपि कर्तु: मध्य: अकेज्यविधोदिने श्रुतिकरस्वात्यश्विपुष्ये, कर्तु: श्रेष्ठ: (स्थात्) ।(इदं)अखिल अशौचात्परत विचायंम् मध्ये तुयथासम्भवं (कार्यम्) ॥ ५०-५१ ॥। कर्त्ता की जन्मतारा अर्थात् जन्मनक्षत्र और जन्मनक्षत्र से दशवाँ वा उन्नीसवाँ नक्षत्र और प्रत्यरि तारा अर्थात् जन्मनक्षत्र से पाँचवाँ, चौदहवाँ और तेइसवाँ नक्षत्र. इनमें और कर्त्ता की जन्मराशि से आठवें, चौथे, बारहवें चन्द्रमा के रहते शवप्रतिकृतिदाह शुभ नहीं होता । अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, पुनर्वंसु, तीनों उत्तरा, रोहिणी, विशाखा, मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा इन नक्षत्रों मेंऔर बुधवार में शवप्रतिक्ृतिदाह मध्यम; रविवार बृहस्पति और सोमवार में श्रवण, हस्त, स्वाती, अदिवनी, पुष्य नक्षत्र में शवप्रातकृतिदाह श्रेष्ठ है। मरने के दिन से लेकर दश दिन बीत गये हों तो यह सम्पूर्ण विचार करना चाहिए ॥ ५०-५१ ॥।
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