भद्रातियी रविजभूतनयाकंवारे दीशायंमाजचरणादितिवह्लिवरवे । त्रपुष्करो भवति मृत्युविनाशबुद्धो त्रेगुण्यदटोी. द्विगुणकृद्दसुतक्षचान्द्रे ॥|४९ ॥॥ अस्वय:--भद्रातिथिः,. रविजभूतनयाकंवारे, द्वीशायंमाजचरणादितिवल्िवेश्वे, मृत्युविनाशवृद्धौ त्रेगुण्यदः त्रेपुष्करो भवति । (एवं) भद्गरातिथि:, रविजभूतनयाकंवारे, वसुतक्षचान्द्रे, मृत्युविनाशवृद्धों द्विगुणकृत् (द्विंपुष्करो योगो) भवति ॥| ४६ ।। शनैहचर, मंगल या रविवार हो; दुइज, सप्तमी वा द्वादशी तिथि हो; विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, पुनर्वंसु, कृत्तिका वा उत्तराषाढ़ नक्षत्र हो तो त्रिपुष्कर योग होता है। इस योग में यदि किसी के घर में कोई मरे तो तीन प्राणी मरें। और यदि कोई वस्तु नष्ट हो जाय तो तीन नष्ट हों यदि किसी वस्तु का लाभ हो तो तीन बस्तुओं का लाभ हो । यदि रविवार, मंगल, शनैश्चर इन्हीं दिनों में दुइज, सप्तमी वा द्वादशी यही तिथि हों और धनिष्ठा, चित्रा या मृगशिरा नक्षत्र हो तो द्विपुष्कर योग होता है। इसमें कोई मरे तो उस घर में दो मरें, कोई वस्तु नष्ट हो तो दो नष्ट हों और कुछ लाभ हो तो दो का लाभ हो ॥ ४९ ॥
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