Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 47
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

रौद्राहिशाक्राम्बुपयास्यपूर्वादिदेववस्वग्निष_ पापवारे । रिक्ताहरिस्कन्ददिने च रोगे जी त्र॑ भवेद्रोगिजनस्य मृत्यु: ॥ ४७ अन्वयः--रोद्राहिशाक्रां म्बुपया म्यपूर्वाद्वि देववस्वग्निषु, पापवारे, रिक्ताहरिस्कन्ददिने च, रोगे रोगिजनस्य शीक्र मृत्युभंबेत्‌ ॥ ४७ ।॥। आर्द्री, आश्लेषा, ज्येष्ठा, शतभिष, भरणी, तीनों पूर्वा, विदश्ाखा, धनिष्ठा अथवा क्ृत्तिका नक्षत्र; रविवार, मंगल वा शर्नइ्चर दिन और चौथि, नवमी, चतुदंशी, द्वादशी वा छठि तिथि; ऐसे थोग में यदि रोग उत्पन्न हो तो रोगी की शीकष्र ही मृत्यु होती है ॥। ४७ ॥

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