Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 46
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

तुलभ्टमिश्रेशप यमाहिमुलभे बेब्येश5थ्थ यमाहि सोध्म्जजवेब्वे [अत्रान्वयः श्लोकक्रमेण] (भवति) ॥ ५६।' हि मूलार्निदास्रे नव, पिल्यभे नखा:, बुध्न्यायेमेज्यादितिधात॒भे नगा:, अब्जवेश्बे मास: । अथ मिश्रेशपित्ये, फणिदंशने मृतिः (स्यात्‌) ॥| ४५-४६ ॥। मूल, कृत्तिका और अछ्िवनी में हो तोनव दिन तक; मधघा में हो तो बीस दिन तक; उत्तराभाद्रपद, उत्तराफात्गुनी, पुष्य, पुनर्वंसु, रोहिणी में हो तो सात दिन तक; मृगशिरा और उत्तराषाढ़ में होतो एक महीने तक ज्वर रहता है। यदि भरणी, आइलेषा, मूल, कृत्तिका, विशाखा, आर्द्रा वा मघा नक्षत्र में किसी को सपपं काटे तो उसकी मृत्यु होती है। चन्द्रमा बली हो तो शायद बच जाय ॥। ४५-४६ ॥।

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse