Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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मृदुश्रुवक्षिप्रचरे ज्ञे गुरो वा खलग्नगे। विधौ ज्ञजीववर्गस्थे शिल्पविद्या प्रशस्यते ।। ४११ अन्वयः--पृदु ध्रुवक्षिप्रचरे, ज्ञे खलग्नगें, वा गरो खलग्नगे, विधौ ज्ञजीववर्गस्थ शिल्पविद्या प्रशस्यते ।। ४१॥। मृदुसंज्ञक, श्रुवसंज्ञक, क्षिप्रसंत्क और चरसंज्ञक नक्षत्रों में; लग्न और दद्वें स्थान में बुध या बृहस्पति के रहते; बुध और बृहस्पति के षड़वर्ग में चन्द्रमा के रहते शिल्पविद्या का प्रारम्भ करना शुभदायक होता है ।।|४१॥।
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