Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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व्यन्त्यादिति ध्रवमघानिलसापंधिष्ण्य रिक्ते तिथौ चरतनौ विकवीन्दुवारे । स्नान रुजा विरहितस्य जनस्य शास्तं हीने विधो खलखग भंवकेन्द्रकोणे ।। ४० ॥॥ अन्वयः--व्यन्त्यादिति ध्रुवमघानिलसा पंधिष्ण्ये, रिक््ते तिथौ, चरतनौ, विकवीन्दुवारे, विधो हीने, खलखगे: भवकेन्द्रकोणे, (तदा) रुजा विरहितस्य [जनस्य | स्नान शस्तम् ।। ४० ॥। रेवती, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मघा, स्वाती और आइ्लेषा को छोड़ अन्य नक्षत्रों में; रिक्तासंज्ञक तिथियों में; शुक्रवार और सोमवार को छोड़ अन्य दिनों में, मेष; कक, तुला और मकर लग्न में निषिद्ध स्थान में चन्द्रमा के रहते और गेरहवें, पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें स्थान में पापग्रहों केरहते रोग से छूटे हुए पुरुष का स्नान करना शुभदायक होता हे ॥। ४० ॥।
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