Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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मुलादाभरणीपित्र्यमृगे सौम्ये घंटे तनो । सुखे शुक्रेषष्टमे शुद्ध सिद्धिवोराभिचारयो: ७ ३९॥ अन्वयः--मुलार्द्राभरणी पिल्यमृगे, घटे तनौ सौम्य े, शुक्रे सुखे, अष्टमे श॒द्धे वीराभिचारयो: सिद्धि: (भवति) || ३८ ॥। मूल, आर्द्रा, भरणी, मघा और मृगशिरा नक्षत्र में; बुधयुक्त कुम्भ लग्त में: लग्न से चौथे स्थान में शुक्र के रहते और आठवें स्थान में किसी ग्रह के न रहते वीरसाधन और अभिचार करना सिद्धिकारक होता है ॥| ३९ ॥।
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