Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 27
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

स्वात्यादित्यमृदुहिदेवगुरुभे कर्णत्रयाइवे चरे लग्ने धर्मंसुताष्ठशुद्धिसहिते द्रव्यप्रयोग: शुभः । नारे ग्राह्ममृ्ण तु संक्रमदिने वुद्धों करेष्कं5छ्लि यत्‌ तहंशेष भवेदूर्ण न च बुधे देये कदाचिद्धनम्‌ ॥ २७॥ अन्वयः--प्त्रात्यादित्यमृदुद्विदेवगुरुभे, कर्णत्रयाश्वे, धरंसुताष्टशुद्धिसहिते, चरे लग्ने, द्रव्यप्रयोग: शुभ: । आरेतु संक्रमदिने वृद्धो, करे5केंडक्नि, ऋण न ग्राह्मं, यत्‌ (यस्मात्‌) तद्वंशेषु ऋणं भवेत्‌ । बुधे कदाचिद्धनं न देयम्‌ ॥ २७॥। स्वाती, पुन्वेसु, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, विशाखा, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, और अद्िवनी, इन नक्षत्रों में; चर लग्न में; नवें और पाँचवें स्थान में शुभग्रहों केरहते और आठवें स्थान में किसी ग्रह के न रहते द्रव्य का प्रयोग अर्थात्‌ ऋण आदि देना वा रोजगार में लगाना शुभ होता है। मजझ्भल के दिन, संक्रान्ति केदिन, जिस दिन वृद्धि योग हो उस दिन, हस्त नक्षत्र मेंऔर रविवार को ऋण नहीं लेना चाहिए; क्योंकि इन दिनों में लिया हुआ ऋण लेनेवांले के वंशभर में होता है; पुत्र-पौत्रादिकों में सेकिसी का दिया नहीं चुकता । बुधवार को कोई किसी को भी अपना धन किसी तरह से भी न दे ॥ २७॥।

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