Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 28
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

मुलद्ीशमघाचर श्रुवमृदुष्षिप्रविनाक॑ शनि पापहीनबलंबिधा जलग॒ृहे शुक्रे विधो मांसले। लग्ने देवगुरो हलप्रवहणं शस्तं न सिहे घटे कर्काजंणधटे तनौ क्षयकरं रिक्तासु षष्ठयां तथा॥ २८१ अन्वयः--मलद्वीशमघाचर ध्रृवमृदुक्षिप्रैट, अक, शनि विना, पापेः हीनबले:, विधो जललवे, शुक्रे विधौ मांसले, देवगुरो लग्ने हलप्रवहरणं शस्तम्‌ । सिंहे घटे, कर्काजेणधटे तनौ तथा रिक्‍तास्‌ षष्ट्यां क्षयकरम्‌ ।। २८ ॥। मूल, विशाखा, मघा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनवंसु, स्वाती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, अद्विनी, पुष्य और हस्त इन नक्षत्रों में; शनिवार और रविवार छोड़ अन्य दिनों में; पापग्रहों के निबंल रहते; और जलराशि में चन्द्रमा के रहते; शुक्र के उदय रहते; लग्न में पूर्ण चन्द्रमा वा बृहस्पति के रहते पहिले पहिल हल चलाना शुभदायक होता है । यदि सिंह, कुम्भ, कर्क, मेष, मकर और तुला लग्न; चौथि, नवमी, चतुदंशी, छठि और अष्टमी तिथि हो तो क्षयकारक होता है ॥ २८ ॥।

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