Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 26
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

क्षिप्रे मैत्रे वित्सिताकेज्यवारे सौम्ये लग्नेःकें कुजे वाखलाभे । योनेमेंत्रयां राशिपोइ्चापि सैत्ष्यां सेवा कार्या स्वासिनः सेवकेन ॥ २६ ॥। अन्वयः--क्षिप्रे, मैत्रे, वित्सितार्केज्यवारे, सौम्ये लग्ने, अर्के खलाभे, वा कुज खलाभे, योने्मेत्यां च,राशिपो: अपि मैंत्यां, (तदा) सेवकेन स्वामिनः सेवा कार्या ॥ २६ ।। अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा और रेवती, इन नक्षत्रों में; बुध, शुक्र, रविवार, बृहस्पति इन वारों में; लग्न में शुभग्रहों के रहते; दशवें और गेरहवें स्थान में सूर्य वा मंगल के रहते सेवक को स्वामी की सेवा करने का प्रारम्भ करना शुभदायक होता है। परन्तु वहाँ इतना और विचारना चाहिए कि स्वामी और सेवक के जन्मनक्षत्र की योनियों में परस्पर मित्रता और दोनों के जन्मराशीशों की परस्पर मित्रता हो ॥ २६॥

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