Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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तीक्षणमिश्र प्रुवोग्रेयंद्द्॒व्य॑ दत्त निवेशितम् । प्रयुक्त च॒विनष्टं च॒विष्टयां पाते च नाप्यते ॥ २४॥ कणमिश्र भ्र॒वोग्रै., विष्टचां, पाते व यद्द्रव्यम् दत्त, निवेशितम, प्रयुक्त अन्वयः--ती विनष्टं च (तत्) न आप्यते ॥ २४ ॥। तीक्ष्णसंज्ञ़क, मिश्रसंज्ञक, श्रुवसंज्ञ़क और उमग्रसंज्ञक नक्षत्रों में और भद्गरा वा व्यतीपात में जो द्रव्य किसी को दी जाय, अथवा धरोहर धरी जाय अथवा ऋण दिया जाय, अथवा कहीं गिर पड़े या चोरी जाय वह फिर किसी तरह न मिले ॥ २४ ॥।
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