Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 20
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

मुद्राणां मुद्रापातन और वस्त्रक्षालन मुहूत्ते पातनं सद्‌प्रुवमृदुचरभक्षिप्रभ्वीन्दुसौरे घत्ने पूर्णाजयाख्ये न च गुरुभुगुजास्ते विलग्ने शुर्भः स्थात्‌ । वस्त्राणां क्षालनं सहसुहयदिनकृत्‌पन्चकादित्यपुष्ये नो रिक्तापबंषष्ठीपितृदिनरविजज्ञेषु कार्य कदापि ॥ २०॥ अन्वयः-- भुवमृदुच रभक्षिप्रभै:, वीन्दुसौरे घस्त्रे, पूर्णाजयाख्ये (तिथ्ये), गुरुभुगुजास्ते न शुभेः विलग्ने मुद्राणां पातनं सत्‌ । वसृहयदिनकृत्पञ्चकादित्यप्रुष्ये, वस्त्राणां क्षालनम्‌ सत्स्यात्‌ । रिक्‍्तापबंषष्ठी पितृदिनरविजज्ञेषु, वस्त्राणां क्षालनं कदापि नो कार्यम्‌ ।। २० ।। श्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, चरसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में; सोमवार और शनैरचर को छोड़ अन्य दिनों में; पठन्चमी, दशमी, पूर्णमासी, तीज, अष्टमी, त्रयोदशी इन तिथियों में, बृहस्पति और शुक्र के अस्तकाल को छोड़कर, लग्न में शुभ ग्रहों के रहते मुद्रापातन अर्थात्‌ राजचिह्नयुक्त मुद्रा ढहलवाना और खजाने में जमा करना शुभ है और धनिष्ठा, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र में; चौथि, नवमी, चतुद्देशी, पर्व अर्थात्‌ कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्देशी, अमावस्या, पूणिमा, सूर्य की संक्रान्ति का दिन, छठिं, पितृश्राद्ध कादिन, शनैरचंर और बुधवार को छोड़ अन्य तिथियों और दिनों में पहिले पहल कपड़ा धोने के लिए धोबी को देना शुभ है ॥ २० ॥।

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