Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 19
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

स्याद्भ्षाघटन त्रिपुष्करचरक्षिप्र ध्रुवे रत्नयुक्‌ तत्तीक्ट्नोग्रविहीनभे रविकुजे मेषालिसिहे तनौ। तन्मुक्तासहितं॑ चर श्रुवमृदुक्षिप्रे शुभे सत्तनौं तीक्ष्णोग्राव्विमृगे द्विदवदहने शस्त्र शुभ घट्टितम्‌ ॥ १९॥ अन्वय:--त्रिपुष्कर चरक्षिप्रभ्रवे, भूषाघटन सत्‌ स्यात्‌ । तीक्षणोग्रविहीनभे, रविक्कुजे (वारे) मेषालिसिंहे तनौ रत्नयूक तत्‌ (भूषाघटनं) सत । चर ध्रुवमृदृक्षिप्रे शुभे सत्तनौ, मक्‍तासहितं तत (भूषाघटनं ) शुभम्‌ । तीक्ष्णोग्राश्विमृगे द्विदेवदहने शस्त्र घट्टित॑ शभम्‌ ।। १४ |। त्रिपुषकर योग में और श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, पुष्य, अश्विनी, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा इन नक्षत्रों मेंआभूषण बनवाना अथवा धारण करना चाहिए। यदि आभूषण रत्नों से युक्त हो तो मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आइ्लेषा, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा को छोड़कर अन्य नक्षत्रों में; रविवार और मड्भलवार में; मेष, वृष्चिक, सिंह लग्न में बनवाना और धारण करना चाहिए। चरसंज्ञक, श्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, क्षिंप्रसंज्ञक नक्षत्रों में; सोमवार और शुक्रवार में; कर्क, बृष, तुला लग्न में, मोतीयुक्त और चाँदी के आभूषण बनवाना और धारण करना चाहिए। मुल, ज्येष्ठा, आर्द्री, आइ्लेषा, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा, अश्विनी, मृगशिरा, विजश्ञाखा, कृत्तिका इन नक्षत्रों मेंहथियार धारण करना और बनवाना शुभ होता है ॥ १९॥।

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse