अन्वयः--विरिक्ते (तिथौ) शाुक्रज्याकह्नि, मैत्र श्रुवलघ्सहितादित्यशाक्रद्विदेवे, स्थिराख्ये लग्नेषपि, शशिनि शुभदृष्टे, शुन्नः केन्द्रगः, कुन्तवर्मष्वसनशरक्रपाणासिपुत्य: सन्धार्या: स्यु: । भ्रृवमृदुलघुहयेन्तकादित्ये शय्यासनादे: भोग: इष्ट: स्यात् ॥-२१॥। रिक्ता तिथियों को छोड़ अन्य तिथियों में, श॒क्र, बृहस्पति और रविवार में, मैत्रसंज्षक, श्रुवसंज्ञक, लघ॒संज्ञकसहित पुनर्वसु, ज्येष्य और विशाखा नक्षत्र में; स्थिर अर्थात् वृष, सिह, वृश्चिक अथवा कुम्भ लग्न में चन्द्रमा के रहते और शुभ ग्रहों से देखते तथा केन्द्र में शुभ ग्रहों केरहते बरछी, कवच, धनुष-बाण, तलवार, छरी आदि धारण करना चाहिए। श्रवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, लघुसंज्ञक, श्रवण, भरणी और पुनर्वसु में शय्या और आसन आदि का उपभोग हितकारक होता है ॥| २१॥
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